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Thursday, February 23, 2017

क्या फरक पड़ता है…



क्या फरक ता है कि
फ़िर लापता है तु,
तेरी शख्सीयत तो मिल जाती है अकेले चाँद में आज भी
 खामोश उम्मीदों  में
रह न पाते युं,
तेरी गैरहाज़िरी कि गुफ़्त्गु भी मगर मेरे साथ थी

क्या फरक ता है

क्या फरक ता है कि
छू लिया किसी और को,
रंगीन तो तुझसे भी शाम कितनो कि आबाद थी।
दिन में चाहे आज संग
कितने हि साथ हो,
बिस्तर में कल रात फ़िर तेरी ही तो याद थी।

क्या फरक ता है


क्या फरक ता है कि
मुझे हि रोग समझ बैठा है,
जंग तेरी तो चाहे खुद के हि नासूरों के साथ थी
इस बहाने हि सही
तुझे लड़ना तो पड़ेगा,
शायद फ़िर मुम्किन हो यारी कुछ जीत के ही बाद ही।


कुछ तो फरक ता है

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